किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 15 (ख) · दोहा/सोरठा
कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग।
कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग।
बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग।।15(ख)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 4.15 · पुस्तक पृ. 696, 697
भावार्थ और शब्दार्थ
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1 कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग।
कभी दिन में घना अंधकार हो जाता है, तो कभी सूर्य प्रकट होता है।
English explanation
Sometimes dense darkness falls during the day; at other times the sun appears.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कबहुँ | कभी | sometimes |
| दिवस | दिन | the day |
| महँ | में | during |
| निबिड़ | घना | dense |
| तम | अंधकार | darkness |
| कबहुँक | कभी | at other times |
| प्रगट | प्रकट होता है | appears |
| पतंग | सूर्य | the sun |
2 बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग।।15(ख)।।
जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उत्पन्न होता है।
English explanation
Just as knowledge perishes through bad company and arises through good company.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिनसइ | नष्ट होता है | perishes |
| उपजइ | उत्पन्न होता है | arises |
| ग्यान | ज्ञान | knowledge |
| जिमि | जैसे | just as |
| पाइ | पाकर | upon encountering |
| कुसंग | बुरी संगति | bad company |
| सुसंग | अच्छी संगति | good company |
| ख | पद-संदर्भ का चिह्न ‘ख’ | verse reference marker ‘ख’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 15 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 4.15
- सहायक विषय
- वर्षा-ऋतु-वर्णन
- मुद्रित पृष्ठ
- 696, 697
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।