किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 16 · दोहा/सोरठा
चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि।
चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि।
जिमि हरिभगत पाइ श्रम तजहि आश्रमी चारि।।16।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 4.16 · पुस्तक पृ. 697, 698
भावार्थ और शब्दार्थ
1चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि।
राजा, तपस्वी, व्यापारी और भिक्षुक प्रसन्न होकर नगर छोड़कर चल पड़े।
English explanation
Kings, ascetics, merchants, and mendicants joyfully left the city and set out.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चले | चल पड़े | set out |
| हरषि | प्रसन्न होकर | joyfully |
| तजि | छोड़कर | having left |
| नगर | नगर | the city |
| नृप | राजा | kings |
| तापस | तपस्वी | ascetics |
| बनिक | व्यापारी | merchants |
| भिखारि | भिक्षुक | mendicants |
2 जिमि हरिभगत पाइ श्रम तजहि आश्रमी चारि।।16।।
संभावित पाठगत त्रुटि को ध्यान में रखकर: जैसे चारों आश्रमों के लोग हरि की भक्ति पाकर अपने श्रम छोड़ देते हैं।
English explanation
Allowing for a likely textual error: just as people of all four stages of life attain devotion to Hari and relinquish their arduous striving.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जिमि | जैसे | just as |
| हरिभगत | हरि की भक्ति—संभावित अभिप्राय | devotion to Hari—probable intended meaning |
| पाइ | पाकर | having attained |
| श्रम | श्रम और कठिन प्रयत्न | toil and arduous striving |
| तजहि | छोड़ देते हैं | relinquish |
| आश्रमी | आश्रमों में रहने वाले लोग | people in the stages of life |
| चारि | चारों | all four |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 16
- स्रोत अभिलेख
- 4.16
- सहायक विषय
- शरद्-ऋतु-वर्णन
- मुद्रित पृष्ठ
- 697, 698
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।