किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 5 · दोहा/सोरठा
सखा बचन सुनि हरषे कृपासिधु बलसींव।
सखा बचन सुनि हरषे कृपासिधु बलसींव।
कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव ।।5।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 4.5 · पुस्तक पृ. 685, 686
भावार्थ और शब्दार्थ
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1सखा बचन सुनि हरषे कृपासिधु बलसींव।
मित्र के वचन सुनकर कृपा के समुद्र और बल की पराकाष्ठा राम प्रसन्न हुए।
English explanation
Hearing his friend’s words, Rama, the ocean of compassion and the pinnacle of strength, rejoiced.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सखा | मित्र के | his friend’s |
| बचन | वचन; बातें | words |
| सुनि | सुनकर | hearing |
| हरषे | प्रसन्न हुए | rejoiced |
| कृपासिधु | कृपा के समुद्र, राम | ocean of compassion, Rama |
| बलसींव | बल की परम सीमा, राम | the pinnacle of strength, Rama |
2 कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव ।।5।।
‘हे सुग्रीव, किस कारण तुम वन में रहते हो? मुझे बताओ।’
English explanation
‘Sugriva, for what reason do you live in the forest? Tell me.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कारन | कारण | reason |
| कवन | कौन-सा; किस | what; which |
| बसहु | तुम रहते हो | you dwell |
| बन | वन में | in the forest |
| मोहि | मुझे | to me |
| कहहु | बताओ | tell |
| सुग्रीव | हे सुग्रीव | O Sugriva |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 5
- स्रोत अभिलेख
- 4.5
- सहायक विषय
- श्रीरामजीसे हनुमान्जीका मिलना और श्रीराम-सुग्रीवकी मित्रता
- मुद्रित पृष्ठ
- 685, 686
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