किष्किन्धाकाण्ड · छंद · छंद
सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं।
मूल पाठ
सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं।
जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं॥
मोहि जानि अति अभिमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही।
अस कवन सठ हठि काटि सुरतरु बारि करिहि बबूरही॥
स्रोत अभिलेख 4.1 · पुस्तक पृ. 692, 692
भावार्थ
मूल पाठ के बादश्रुतियाँ 'नेति-नेति कहकर निरन्तर जिनका गुणगान करती रहती हैं, तथा प्राण और मनको जीतकर एवं इन्द्रियोंको [विषयोंके रससे सर्वथा] नीरस बनाकर मुनिगण ध्यानमें जिनकी कभी क्वचित् ही झलक पाते हैं, वे ही प्रभु (आप) साक्षात् मेरे सामने प्रकट हैं। आपने मुझे अत्यन्त अभिमानवश जानकर यह कहा कि तुम शरीर रख लो। परन्तु ऐसा मूर्ख कौन होगा जो हठपूर्वक कल्पवृक्षको काटकर उससे बबूरके बाड़ लगावेगा (अर्थात् पूर्णकाम बना देनेवाले आपको छोड़कर आपसे इस नश्वर शरीरकी रक्षा चाहेगा)?॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 692 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं।
English explanation
That very Lord is now visible before the eyes, whose qualities the Vedas continually sing while saying ‘not this.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सो | वही प्रभु | that very Lord |
| नयन | आँखों के | of the eyes |
| गोचर | दृष्टि में प्रत्यक्ष | within sight; visible |
| जासु | जिनके | whose |
| गुन | गुणों को | qualities |
| नित | नित्य | continually |
| नेति | ‘यह नहीं’—वर्णन से परे | ‘not this’—beyond description |
| कहि | कहकर | saying |
| श्रुति | वेद | the Vedas |
| गावहीं | गाते हैं | sing |
2जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं॥
English explanation
Sages only occasionally attain him in meditation, having mastered the vital breath and mind and withdrawn the senses from sensory pleasures.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जिति | वश में करके | having mastered |
| पवन | प्राणवायु को | the vital breath |
| मन | मन को | the mind |
| गो | इंद्रियों को | the senses |
| निरस | विषय-रस से विरक्त | detached from sensory pleasures |
| करि | करके | having made |
| मुनि | मुनि | sages |
| ध्यान | ध्यान में | in meditation |
| कबहुँक | कभी-कभार | only occasionally |
| पावहीं | प्राप्त करते हैं | attain him |
3मोहि जानि अति अभिमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही।
English explanation
Knowing me to be overcome by great pride, the Lord said, ‘Keep your body alive.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मोहि | मुझे | me |
| जानि | जानकर | knowing |
| अति | अत्यधिक | extreme |
| अभिमान | अभिमान के | pride |
| बस | वश में | under the sway of |
| प्रभु | प्रभु राम ने | Lord Rama |
| कहेउ | कहा | said |
| राखु | बनाए रखो | preserve |
| सरीरही | शरीर को | your body |
4अस कवन सठ हठि काटि सुरतरु बारि करिहि बबूरही॥
English explanation
What fool would obstinately cut down a wish-fulfilling tree and water a thorny acacia instead?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अस | ऐसा | such |
| कवन | कौन | who |
| सठ | मूर्ख | fool |
| हठि | हठपूर्वक | obstinately |
| काटि | काटकर | having cut down |
| सुरतरु | कल्पवृक्ष को | the celestial wish-fulfilling tree |
| बारि | जल; सींचने का पानी | water for irrigation |
| करिहि | देगा; सींचेगा | will apply; will water |
| बबूरही | बबूल को | the thorny acacia |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 4.1
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 692
- सहायक विषय
- बालि-सुग्रीव-युद्ध, बालि-उद्धार
- मुद्रित पृष्ठ
- 692, 692
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।