किष्किन्धाकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना।।
मूल पाठ
सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना।।
समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ।।
स्रोत अभिलेख 4.3 · पुस्तक पृ. 684, 684
भावार्थ
मूल पाठ के बाद[फिर कहा—] हे कपि! सुनो, मनमें ग्लानि मत मानना (मन छोटा न करना)। तुम मुझे लक्ष्मणसे भी दूने प्रिय हो। सब कोई मुझे समदर्शी कहते हैं (मेरे लिये न कोई प्रिय है न अप्रिय) पर मुझको सेवक प्रिय है, क्योंकि वह अनन्यगति होता है (मुझे छोड़कर उसको कोई दूसरा सहारा नहीं होता)॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 684 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना।।
English explanation
Listen, Hanuman: do not consider yourself lesser in your heart. You are twice as dear to me as Lakshmana.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनु | सुनो | listen |
| कपि | हे वानर हनुमान | O Hanuman, the monkey |
| जियँ | मन में | in your heart |
| मानसि | मानो; समझो | consider; regard |
| जनि | मत | do not |
| ऊना | कम; हीन | lesser; deficient |
| तैं | तुम | you |
| मम | मुझे; मेरे लिए | to me |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| लछिमन | लक्ष्मण, राम के भाई | Lakshmana, Rama's brother |
| ते | से | than; compared with |
| दूना | दुगुने | twice as much |
2 समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ।।
English explanation
Everyone calls me impartial, yet a servant is dear to me—one who has no refuge other than me.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| समदरसी | सबको समान देखने वाला | one who regards all equally |
| मोहि | मुझे | me |
| कह | कहते हैं | call |
| सब | सब | all |
| कोऊ | कोई; प्रत्येक व्यक्ति | each person |
| सेवक | सेवक | a servant |
| प्रिय | प्रिय है | is dear |
| अनन्यगति | जिसका अन्य कोई आश्रय नहीं | having no other refuge |
| सोऊ | वह भी; ऐसा ही सेवक | that one in particular |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 4.3
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 684
- सहायक विषय
- श्रीरामजीसे हनुमान्जीका मिलना और श्रीराम-सुग्रीवकी मित्रता
- मुद्रित पृष्ठ
- 684, 684
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।