किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 3 · दोहा/सोरठा
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत।।3।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 4.3 · पुस्तक पृ. 684, 684
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।
हे हनुमान, वही अनन्य है जिसकी यह समझ कभी नहीं डिगती:
English explanation
Hanuman, that person is exclusively devoted whose following conviction never wavers:
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सो | वही व्यक्ति | that person |
| अनन्य | एकमात्र प्रभु में आश्रित | exclusively devoted |
| जाकें | जिसकी | whose |
| असि | ऐसी | such |
| मति | बुद्धि; समझ | understanding; conviction |
| न | नहीं | not |
| टरइ | डिगती; हटती | wavers; departs |
| हनुमंत | हे हनुमान | O Hanuman |
2 मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत।।3।।
‘मैं सेवक हूँ और समस्त चर-अचर जगत जिनका रूप है, वे भगवान मेरे स्वामी हैं।’
English explanation
‘I am the servant, and the Lord, whose form is the entire moving and unmoving world, is my master.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मैं | मैं | I |
| सेवक | सेवक हूँ | am the servant |
| सचराचर | समस्त चर और अचर जगत | the entire moving and unmoving world |
| रूप | रूप वाले; स्वरूप | as his form |
| स्वामि | मेरे स्वामी हैं | is my master |
| भगवंत | भगवान | the divine Lord |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 3
- स्रोत अभिलेख
- 4.3
- सहायक विषय
- श्रीरामजीसे हनुमान्जीका मिलना और श्रीराम-सुग्रीवकी मित्रता
- मुद्रित पृष्ठ
- 684, 684
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।