किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 2 · दोहा/सोरठा
एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान।
मूल पाठ
एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान।
पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान।।2।।
स्रोत अभिलेख 4.2 · पुस्तक पृ. 683, 684
भावार्थ
मूल पाठ के बादएक तो मैं यों ही मन्द हूँ, दूसरे मोहके वशमें हूँ, तीसरे हृदयका कुटिल और अज्ञान हूँ, फिर हे दीनबन्धु भगवान्! प्रभु (आप) ने भी मुझे भुला दिया!॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 684 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान।
English explanation
For one thing, I am dull-witted, subject to delusion, crooked-hearted, and ignorant.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| एकु | एक तो | for one thing |
| मैं | मैं | I |
| मंद | मंदबुद्धि | dull-witted |
| मोहबस | मोह के अधीन | subject to delusion |
| कुटिल | कुटिल | crooked |
| हृदय | हृदय वाला | hearted |
| अग्यान | अज्ञानी | ignorant |
2 पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान।।2।।
English explanation
Moreover, Lord, divine friend of the distressed, you have forgotten me.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुनि | ऊपर से | moreover |
| प्रभु | हे प्रभु | O Lord |
| मोहि | मुझे | me |
| बिसारेउ | आपने भुला दिया | you have forgotten |
| दीनबंधु | हे दीनों के बंधु | O friend of the distressed |
| भगवान | हे भगवान | O divine Lord |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 2
- स्रोत अभिलेख
- 4.2
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 684
- सहायक विषय
- श्रीरामजीसे हनुमान्जीका मिलना और श्रीराम-सुग्रीवकी मित्रता
- मुद्रित पृष्ठ
- 683, 684
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।