किष्किन्धाकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें।।
मूल पाठ
जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें।।
नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा।।
स्रोत अभिलेख 4.3 · पुस्तक पृ. 684, 684
भावार्थ
मूल पाठ के बादहे नाथ! यद्यपि मुझमें बहुत-से अवगुण हैं, तथापि सेवक स्वामीकी विस्मृतिमें न पड़े (आप उसे न भूल जायँ) हे नाथ! जीव आपकी मायासे मोहित है। वह आपहीकी कृपासे निस्तार पा सकता है॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 684 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें।।
English explanation
AI-generated interpretive draft: Lord, although I have many faults, a servant should not fall out of his master's remembrance.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जदपि | यद्यपि | although |
| नाथ | हे स्वामी | O Lord |
| बहु | बहुत | many |
| अवगुन | दोष | faults |
| मोरें | मुझमें; मेरे | in me; mine |
| सेवक | सेवक | a servant |
| प्रभुहि | स्वामी को; स्वामी के लिए | to the master |
| परै | पड़े | should fall |
| जनि | नहीं | not |
| भोरें | भूल में; विस्मृति में | into forgetfulness |
2 नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा।।
English explanation
Lord, the living being is deluded by your maya; it crosses beyond that delusion only through your compassion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नाथ | हे स्वामी | O Lord |
| जीव | जीवात्मा | the living soul |
| तव | आपकी | your |
| मायाँ | माया से | by maya, the power of illusion |
| मोहा | मोहित है | is deluded |
| सो | वह जीव | that soul |
| निस्तरइ | पार होता है; मुक्त होता है | crosses beyond; is freed |
| तुम्हारेहिं | आपकी ही | your alone |
| छोहा | कृपा से | through compassion |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 4.3
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 684
- सहायक विषय
- श्रीरामजीसे हनुमान्जीका मिलना और श्रीराम-सुग्रीवकी मित्रता
- मुद्रित पृष्ठ
- 684, 684
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।