उत्तरकाण्ड · सोरठा 2 (क) · सोरठा
राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात।
मूल पाठ
राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात।
पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात॥ २ (क)॥
स्रोत अभिलेख 7.2 · पुस्तक पृ. 907, 908
भावार्थ
मूल पाठ के बाद[हनुमान्जीने कहा—] हे नाथ! आप श्रीरामजीको प्राणोंके समान प्रिय हैं, हे तात! मेरा वचन सत्य है। यह सुनकर भरतजी बार-बार मिलते हैं, हृदयमें हर्ष समाता नहीं है॥ २ (क)॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 909 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात।
English explanation
My lord, dear one, you are as dear to Rama as his own life; my words are true.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | राम को | to Rama |
| प्रान | प्राणों के समान | as his own life |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| नाथ | हे स्वामी | O lord |
| तुम्ह | आप | you |
| सत्य | सत्य | true |
| बचन | वचन | words |
| मम | मेरे | my |
| तात | हे प्रिय तात | dear one |
2पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात॥ २ (क)॥
English explanation
Hearing this, Bharata embraces Hanuman repeatedly; his heart cannot contain his joy.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुनि | फिर | again |
| पुनि | फिर | again |
| मिलत | गले मिलते हैं | embraces |
| भरत | भरत | Bharata, Rama’s brother |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| हरष | आनंद | joy |
| न | नहीं | not |
| हृदयँ | हृदय में | in the heart |
| समात | समाता | can be contained |
| क | पद्य-संदर्भ चिह्न (क) | verse reference marker (क) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- सोरठा 2 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.2
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 909
- सहायक विषय
- भरत-विरह तथा भरत-हनुमान्-मिलन, अयोध्यामें आनन्द
- मुद्रित पृष्ठ
- 907, 908
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।