उत्तरकाण्ड · छंद · छंद
निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहुँ मम सुमिरन कर्यो।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दरघुवंशके भूषण श्रीरामजी क्या कभी अपने दासकी भाँति मेरा स्मरण करते रहे हैं? भरतजीके अत्यन्त नम्र वचन सुनकर हनुमान्जी पुलकित शरीर होकर उनके चरणोंपर गिर पड़े [और मनमें विचारने लगे कि] जो चराचरके स्वामी हैं वे श्रीरघुवीर अपने श्रीमुखसे जिनके गुणसमूहोंका वर्णन करते हैं, वे भरतजी ऐसे विनम्र, परम पवित्र और सद्गुणोंके समुद्र क्यों न हों?
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 909 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहुँ मम सुमिरन कर्यो।
सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकि तन चरनन्हि पर ्यो॥
रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो।
काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो॥
स्रोत अभिलेख 7.2 · पुस्तक पृ. 907, 908
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहुँ मम सुमिरन कर्यो।
English explanation
AI draft: Has Rama, the ornament of Raghu’s lineage, ever remembered me as his own servant?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निज | अपने | his own |
| दास | सेवक | servant |
| ज्यों | के समान; मानकर | as; considering as |
| रघुबंसभूषन | रघुवंश के भूषण राम | Rama, ornament of Raghu’s lineage |
| कबहुँ | कभी | ever |
| मम | मेरा; मुझे | of me; me |
| सुमिरन | स्मरण | remembrance |
| कर्यो | किया | did |
2सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकि तन चरनन्हि पर ्यो॥
English explanation
Hearing Bharata’s deeply humble words, Hanuman thrilled with goosebumps and fell at his feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनि | सुनकर | having heard |
| भरत | भरत के | Bharata’s |
| बचन | वचन | words |
| बिनीत | विनम्र | humble |
| अति | अत्यंत | exceedingly |
| कपि | हनुमान | Hanuman, the monkey messenger |
| पुलकि | रोमांचित होकर | thrilling with goosebumps |
| तन | शरीर | body |
| चरनन्हि | चरणों में | at the feet |
| पर | गिर पड़े—खंडित क्रिया का अंश | fell—part of a broken verb |
| ्यो | (भरत के चरणों में) गिर पड़ा। | Fell at Bharata’s feet. |
3रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो।
English explanation
One whose many virtues Rama himself recounts with his own mouth—Rama, who is lord of all that moves and does not move—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रघुबीर | रघुवंश के वीर राम | Rama, hero of Raghu’s lineage |
| निज | अपने ही | his own |
| मुख | मुख से | with his mouth |
| जासु | जिसके | whose |
| गुन | गुण | virtues |
| गन | समूह; अनेक | multitude; many |
| कहत | कहते हैं | recount |
| अग | अचर; न चलने वाले प्राणी-पदार्थ | nonmoving beings and things |
| जग | चर; चलने वाले प्राणी | moving beings |
| नाथ | स्वामी | lord |
| जो | जो | who |
4काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो॥
English explanation
Why would that Bharata not be humble, supremely pure, and an ocean of virtues?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| काहे | क्यों | why |
| न | नहीं | not |
| होइ | हो | be |
| बिनीत | विनम्र | humble |
| परम | अत्यंत | supremely |
| पुनीत | पवित्र | pure |
| सदगुन | अच्छे गुणों का | of good qualities |
| सिंधु | समुद्र | ocean |
| सो | वह भरत | that one, Bharata |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 7.2
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 909
- सहायक विषय
- भरत-विरह तथा भरत-हनुमान्-मिलन, अयोध्यामें आनन्द
- मुद्रित पृष्ठ
- 907, 908
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।