उत्तरकाण्ड · सोरठा 95 (क) · सोरठा
पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं।
पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं।
अति नीचहु सन प्रीति करिअ जानि निज परम हित॥ ९५ (क)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.95 · पुस्तक पृ. 997, 997
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं।
हे गरुड़! सज्जन ऐसी वेदसम्मत नीति कहते हैं। (यह अर्थ AI का प्रारूप है।)
English explanation
O Garuda, good people state this principle, approved by the Vedas. (This interpretation is an AI draft.)
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पन्नगारि | हे गरुड़, सर्पों के शत्रु! | O Garuda, enemy of serpents! |
| असि | ऐसी | such |
| नीति | नीति; आचरण का सिद्धांत | principle of conduct |
| श्रुति | वेद | the Vedas |
| संमत | सम्मत; स्वीकृत | approved by |
| सज्जन | सज्जन लोग | good people |
| कहहिं | कहते हैं | say |
2अति नीचहु सन प्रीति करिअ जानि निज परम हित॥ ९५ (क)॥
अपना परम हित जानकर अत्यंत नीच से भी प्रेम करना चाहिए।
English explanation
One should show affection even toward the lowliest, recognizing one's own greatest benefit in doing so.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अति | अत्यंत | extremely |
| नीचहु | नीच से भी | even the lowliest |
| सन | से; के साथ | with; toward |
| प्रीति | प्रेम | affection |
| करिअ | करना चाहिए | one should show |
| जानि | जानकर; समझकर | recognizing |
| निज | अपना | one's own |
| परम | सबसे बड़ा | greatest |
| हित | हित; लाभ | benefit; welfare |
| क | पद का संदर्भ-चिह्न ‘क’ | verse reference marker ‘क’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- सोरठा 95 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.95
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 997, 997
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।