उत्तरकाण्ड · सोरठा 88 (क) · सोरठा
जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद।
जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद।
अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महुँ संतत मगन॥ ८८ (क)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.88 · पुस्तक पृ. 990, 990
भावार्थ और शब्दार्थ
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1जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद।
जिस सुख के लिए कल्याणस्वरूप और सुख देने वाले शिव ने अशुभ वेश धारण किया।
English explanation
For the sake of that bliss, Shiva, auspicious and a giver of happiness, assumed an inauspicious guise.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जेहि | जिस | which |
| सुख | सुख; आनंद | bliss |
| लागि | के लिए | for the sake of |
| पुरारि | त्रिपुरासुर के शत्रु शिव | Shiva, destroyer of Tripura |
| असुभ | अशुभ दिखाई देने वाला | inauspicious-looking |
| बेष | वेश; पहनावा | guise; attire |
| कृत | धारण किया | assumed |
| सिव | कल्याणस्वरूप शिव | Shiva, the auspicious one |
| सुखद | सुख देने वाले | giver of happiness |
2अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महुँ संतत मगन॥ ८८ (क)॥
अयोध्या के स्त्री-पुरुष उसी सुख में सदा मग्न रहते हैं।
English explanation
The men and women of Ayodhya remain constantly immersed in that bliss.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अवधपुरी | अयोध्या नगरी के | of the city of Ayodhya |
| नर | पुरुष | men |
| नारि | स्त्रियाँ | women |
| तेहि | उसी | that very |
| सुख | सुख; आनंद | bliss |
| महुँ | में | in |
| संतत | सदा; निरंतर | always; constantly |
| मगन | मग्न; डूबे हुए | absorbed; immersed |
| क | दोहा ८८ के पहले भाग का संदर्भ-चिह्न | reference marker for the first part of verse 88 |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- सोरठा 88 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.88
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 990, 990
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