उत्तरकाण्ड · श्लोक · श्लोक
कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ।
मूल पाठ
कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ।
जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृङ्गसङ्गिनौ॥२॥
स्रोत अभिलेख मंगलाचरण · पुस्तक पृ. 905, 906
भावार्थ
मूल पाठ के बादकोसलपुरीके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर और कोमल दोनों चरणकमल ब्रह्माजी और शिवजीके द्वारा वन्दित हैं, श्रीजानकीजीके करकमलोंसे दुलराये हुए हैं और चिन्तन करनेवालेके मनरूपी भौंरेके नित्य संगी हैं अर्थात् चिन्तन करनेवालोंका मनरूपी भ्रमर सदा उन चरणकमलोंमें बसा रहता है॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 905 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ।
English explanation
The two lotus feet of Rama, king of Kosala, are beautiful and tender, and are revered by Brahma and Shiva.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ | कोसलराज राम के दोनों सुंदर चरण-कमल | the two beautiful lotus feet of Rama, king of Kosala |
| कोमलावजमहेशवन्दितौ | दोनों कोमल और ब्रह्मा तथा शिव द्वारा वंदित | both tender and revered by Brahma and Shiva |
2जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृङ्गसङ्गिनौ॥२॥
English explanation
Those two feet are lovingly caressed by Janaki’s lotus hands and are companions to the bee-like mind of one who meditates on them.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जानकीकरसरोजलालितौ | जानकी के कमल जैसे हाथों से दुलारे गए दोनों चरण | the two feet lovingly caressed by Janaki’s lotus hands |
| चिन्तकस्य | ध्यान करने वाले के | of the one who meditates |
| मनभृङ्गसङ्गिनौ | मनरूपी भौंरे के दोनों संगी | the two companions of the bee-like mind |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- श्लोक
- स्रोत अभिलेख
- मंगलाचरण
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 905
- सहायक विषय
- मंगलाचरण
- मुद्रित पृष्ठ
- 905, 906
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