उत्तरकाण्ड · श्लोक · श्लोक
कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम्।
मूल पाठ
कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम्।
कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शङ्करमनङ्गमोचनम्॥३॥
स्रोत अभिलेख मंगलाचरण · पुस्तक पृ. 905, 906
भावार्थ
मूल पाठ के बादकुन्दके फूल, चन्द्रमा और शङ्खके समान सुन्दर गौरवर्ण, जगज्जननी श्रीपार्वतीजीके पति, वाञ्छित फलके देनेवाले, [दु:खियोंपर सदा] दया करनेवाले, सुन्दर कमलके समान नेत्रवाले, कामदेवसे छुड़ानेवाले, [कल्याणकारी] श्रीशङ्करजीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 905 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम्।
English explanation
I bow to Shiva, fair and beautiful like jasmine, the moon, and a conch, the husband of Ambika and the giver of desired fulfillment.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं | कुंद-पुष्प, चंद्रमा और शंख जैसे गौर तथा सुंदर | fair and beautiful like jasmine, the moon, and a conch |
| अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम् | अंबिका के पति, इच्छित सिद्धि देने वाले शिव को | to Shiva, Ambika’s husband, who grants desired fulfillment |
2कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शङ्करमनङ्गमोचनम्॥३॥
English explanation
I bow to Shankara, the compassionate Shiva, whose eyes are like beautiful lotuses and who destroyed the god of desire.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कारुणीककलकञ्जलोचनं | करुणामय और सुंदर कमल जैसे नेत्र वाले | compassionate, with eyes like beautiful lotuses |
| नौमि | मैं प्रणाम करता हूँ | I bow |
| शङ्करमनङ्गमोचनम् | कामदेव का नाश करने वाले शंकर को | to Shankara, destroyer of the god of desire |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- श्लोक
- स्रोत अभिलेख
- मंगलाचरण
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 905
- सहायक विषय
- मंगलाचरण
- मुद्रित पृष्ठ
- 905, 906
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।