उत्तरकाण्ड · श्लोक · श्लोक
उबारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।
मूल पाठ
उबारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।
बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल।।122(क)।।
स्रोत अभिलेख 7.122 · पुस्तक पृ. 1036, 1038
भावार्थ
मूल पाठ के बादजलको मथनेसे भले ही घी उत्पन्न हो जाय और बालू [को पेरने] से भले ही तेल निकल आवे; परन्तु श्रीहरिके भजन बिना संसाररूपी समुद्रसे नहीं तरा जा सकता, यह सिद्धान्त अटल है॥ १२२ (क)॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1037 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1उबारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।
English explanation
Even if churning water could produce clarified butter, and sand could yield oil—the reading ‘उबारि’ is uncertain here.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| उबारि | जल | water |
| मथें | मथने से | by churning |
| घृत | घी | clarified butter |
| होइ | बन जाए | were to result |
| बरु | भले ही | even if |
| सिकता | रेत | sand |
| ते | से | from |
| बरु | भले ही | even if |
| तेल | तेल निकल आए | oil were to emerge |
2 बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल।।122(क)।।
English explanation
Without worship of Hari, the ocean of worldly existence cannot be crossed; this is an unalterable principle.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिनु | बिना | without |
| हरि | भगवान हरि के | of Lord Hari |
| भजन | भजन या आराधना | devotional worship |
| न | नहीं | not |
| भव | संसार-सागर | the ocean of worldly existence |
| तरिअ | पार किया जा सकता | can be crossed |
| यह | यह | this |
| सिद्धांत | सिद्धांत | principle |
| अपेल | अटल | unalterable |
| क | पद-संदर्भ का चिह्न (क) | verse reference marker (क) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- श्लोक
- स्रोत अभिलेख
- 7.122
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1037
- सहायक विषय
- भजन-महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 1036, 1038
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।