उत्तरकाण्ड · दोहा 115 (क) · दोहा/सोरठा
-पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर।।
-पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर।।
न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर।।115(क)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.115 · पुस्तक पृ. 1023, 1024
भावार्थ और शब्दार्थ
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1-पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर।।
वही पुरुष स्त्री को त्याग सकता है जो विरक्त और स्थिर बुद्धि वाला हो।
English explanation
A man can renounce a woman if he is dispassionate and steady-minded.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुरुष | पुरुष | a man |
| त्यागि | त्यागना | renounce |
| सक | सकता है | can |
| नारिहि | स्त्री को | a woman |
| जो | जो | who |
| बिरक्त | विरक्त | dispassionate |
| मति | बुद्धि में | in mind |
| धीर | स्थिर | steady |
2 न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर।।115(क)।।
पर वह कामी ऐसा नहीं कर सकता जो विषयों के वश में है और रघुवीर के चरणों से विमुख है।
English explanation
But not a lustful man who is ruled by sense pleasures and turned away from Rama's feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| न | नहीं | not |
| तु | परंतु | but |
| कामी | कामासक्त पुरुष | a lustful man |
| बिषयाबस | इंद्रिय-विषयों के वश में | ruled by sense pleasures |
| बिमुख | विमुख | turned away |
| जो | जो | who |
| पद | चरणों से | from the feet |
| रघुबीर | रघुवंश के वीर राम के | of Rama, hero of Raghu's lineage |
| क | पद-संदर्भ का चिह्न ‘क’ | verse reference marker ‘क’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 115 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.115
- सहायक विषय
- काकभुशुण्डिजीका लोमशजीके पास जाना और शाप तथा अनुग्रह पाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 1023, 1024
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