उत्तरकाण्ड · दोहा 115 (ख) · दोहा/सोरठा
सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि।
सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि।
बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट।।115(ख)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.115 · पुस्तक पृ. 1023, 1024
भावार्थ और शब्दार्थ
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1 सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि।
ज्ञान का भंडार वह मुनि भी, मृगनयनी स्त्री का चंद्रमा जैसा मुख देखकर—
English explanation
Even that sage, a treasury of knowledge, upon seeing the moonlike face of a doe-eyed woman—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सोउ | वह भी | even that |
| मुनि | मुनि | sage |
| ग्याननिधान | ज्ञान का भंडार | a treasury of knowledge |
| मृगनयनी | हिरनी जैसी आँखों वाली स्त्री का | of a doe-eyed woman |
| बिधु | चंद्रमा जैसा | moonlike |
| मुख | मुख | face |
| निरखि | देखकर | upon seeing |
2 बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट।।115(ख)।।
विवश हो जाता है। हे हरि के भक्त, स्त्री विष्णु की माया का प्रकट रूप है।
English explanation
—becomes helpless. O devotee of Hari, woman is the manifest form of Vishnu's maya.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिबस | विवश | helpless |
| होइ | हो जाता है | becomes |
| हरिजान | हे हरि के भक्त | O devotee of Hari |
| नारि | स्त्री | woman |
| बिष्नु | भगवान विष्णु की | of Lord Vishnu |
| माया | माया | maya, the power of illusion |
| प्रगट | प्रकट रूप | manifest form |
| ख | पद-संदर्भ का चिह्न ‘ख’ | verse reference marker ‘ख’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 115 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 7.115
- सहायक विषय
- काकभुशुण्डिजीका लोमशजीके पास जाना और शाप तथा अनुग्रह पाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 1023, 1024
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