उत्तरकाण्ड · दोहा 116 (क) · दोहा
यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोइ।
यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोइ।
जो जानइ रघुपति कृपाँ सपनेहुँ मोह न होइ॥ ११६ (क)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.116 · पुस्तक पृ. 1025, 1025
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोइ।
रघुनाथ के इस रहस्य को कोई शीघ्र नहीं जान पाता।
English explanation
No one readily understands this mystery of Rama.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| यह | यह | this |
| रहस्य | गूढ़ बात | mystery |
| रघुनाथ | रघुकुल के नाथ श्रीराम | Rama, lord of the Raghu dynasty |
| कर | का | of |
| बेगि | शीघ्र; सहज ही | quickly; readily |
| न | नहीं | not |
| जानइ | जानता है | understands |
| कोइ | कोई | anyone |
2जो जानइ रघुपति कृपाँ सपनेहुँ मोह न होइ॥ ११६ (क)॥
जो रघुपति की कृपा से इसे जान लेता है, उसे सपने में भी मोह नहीं होता।
English explanation
Whoever understands it through Rama’s grace is not deluded even in a dream.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जो | जो व्यक्ति | whoever |
| जानइ | इस रहस्य को जानता है | understands this mystery |
| रघुपति | रघुकुल के स्वामी श्रीराम की | of Rama, lord of the Raghu dynasty |
| कृपाँ | कृपा से | through grace |
| सपनेहुँ | सपने में भी | even in a dream |
| मोह | भ्रम या अज्ञानजनित आसक्ति | delusion or attachment born of ignorance |
| न | नहीं | not |
| होइ | होता है | arises |
| क | पद-संदर्भ का चिह्न (क) | verse reference marker (क) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 116 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.116
- सहायक विषय
- ज्ञान-भक्ति-निरूपण, ज्ञानदीपक और भक्तिकी महान् महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 1025, 1025
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