उत्तरकाण्ड · दोहा 119 (क) · दोहा
सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि।
सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि।
भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि॥ ११९ (क)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.119 · पुस्तक पृ. 1029, 1030
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि।
एआई प्रारूप: हे गरुड़, सेवक और सेव्य का भाव रखे बिना संसार-सागर पार नहीं किया जा सकता।
English explanation
AI draft: O Garuda, the ocean of worldly existence cannot be crossed without the disposition of a servant toward the one served.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सेवक | सेवा करने वाला भक्त | the devotee who serves |
| सेब्य | जिनकी सेवा की जाए; यहाँ प्रभु | the one served; here, the Lord |
| भाव | संबंध का भाव | sense of relationship |
| बिनु | बिना | without |
| भव | संसार-सागर | the ocean of worldly existence |
| न | नहीं | not |
| तरिअ | पार किया जा सकता | can be crossed |
| उरगारि | हे गरुड़, सर्पों के शत्रु | O Garuda, enemy of serpents |
2भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि॥ ११९ (क)॥
एआई प्रारूप: इस सिद्धांत पर विचार करके राम के चरण-कमलों का भजन करो।
English explanation
AI draft: Reflecting on this principle, worship Rama’s lotus feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भजहु | भजन करो | worship |
| राम | भगवान राम के | of Lord Rama |
| पद | चरण | feet |
| पंकज | कमल | lotuses |
| अस | इस प्रकार का | such; this |
| सिद्धांत | निश्चित निष्कर्ष | established principle |
| बिचारि | विचार करके | having reflected on |
| क | पद-संदर्भ चिह्न (क) | verse reference marker (a) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 119 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.119
- सहायक विषय
- ज्ञान-भक्ति-निरूपण, ज्ञानदीपक और भक्तिकी महान् महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 1029, 1030
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।