उत्तरकाण्ड · दोहा 79 (ख) · दोहा
सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति मोरि।
सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति मोरि।
गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि ब्याकुल भयउँ बहोरि॥ ७९ (ख)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.79 · पुस्तक पृ. 982, 982
भावार्थ और शब्दार्थ
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1सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति मोरि।
सात आवरणों को भेदकर, जहाँ तक मेरी पहुँच थी—
English explanation
Having pierced the seven enclosing layers, as far as I could reach—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सप्ताबरन | ब्रह्मांड के सात आवरण | the seven enclosing layers of the cosmos |
| भेद | भेदन | piercing |
| करि | करके | having done |
| जहाँ | जहाँ | where |
| लगें | तक | as far as |
| गति | पहुँच; जाने की सामर्थ्य | reach; ability to travel |
| मोरि | मेरी | my |
2गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि ब्याकुल भयउँ बहोरि॥ ७९ (ख)॥
मैं वहाँ तक गया; वहाँ भी प्रभु की भुजा देखकर फिर व्याकुल हो गया।
English explanation
I went that far; seeing the Lord’s arm there too, I became distressed again.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गयउँ | मैं गया | I went |
| तहाँ | वहाँ | there |
| प्रभु | प्रभु राम की | of the Lord Rama |
| भुज | भुजा | arm |
| निरखि | देखकर | on seeing |
| ब्याकुल | व्याकुल; घबराया हुआ | distressed; agitated |
| भयउँ | मैं हो गया | I became |
| बहोरि | फिर | again |
| ख | पद-संदर्भ चिह्न ‘ख’ | verse reference marker ‘ख’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 79 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 7.79
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 982, 982
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