उत्तरकाण्ड · दोहा 100 (ख) · दोहा
श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक।
श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक।
तेहिं न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक॥ १०० (ख)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.1 · पुस्तक पृ. 1002, 1002
भावार्थ और शब्दार्थ
1श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक।
एआई-प्रारूप अर्थ: वेदों द्वारा मान्य हरि-भक्ति का मार्ग वैराग्य और विवेक से युक्त है।
English explanation
AI draft meaning: The path of devotion to Hari, approved by the Vedas, is joined with dispassion and discernment.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| श्रुति | वेद | the Vedas |
| संमत | मान्य; अनुमोदित | approved |
| हरि | भगवान हरि | Hari, the Lord |
| भक्ति | भक्ति; प्रेमपूर्ण उपासना | devotion |
| पथ | मार्ग | path |
| संजुत | से युक्त | joined with |
| बिरति | वैराग्य; आसक्ति से निवृत्ति | dispassion; freedom from attachment |
| बिबेक | विवेक; उचित-अनुचित की पहचान | discernment of right and wrong |
2तेहिं न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक॥ १०० (ख)॥
एआई-प्रारूप अर्थ: मनुष्य मोह के वश होकर उस मार्ग पर नहीं चलते, बल्कि अनेक मार्ग गढ़ते हैं।
English explanation
AI draft meaning: Under the sway of delusion, people do not follow that path but devise many paths of their own.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तेहिं | उस मार्ग पर | on that path |
| न | नहीं | not |
| चलहिं | चलते हैं | walk; follow |
| नर | मनुष्य | people |
| मोह | मोह; भ्रमपूर्ण आसक्ति | delusion; misguided attachment |
| बस | के वश में | under the sway of |
| कल्पहिं | कल्पना करके गढ़ते हैं | devise; invent |
| पंथ | मार्ग; मत-पंथ | paths; religious ways |
| अनेक | अनेक | many |
| ख | दोहा १०० के दूसरे भाग का संदर्भ-चिह्न | reference marker for the second part of verse 100 |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 100 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 7.1
- सहायक विषय
- काकभुशुण्डिका अपनी पूर्वजन्मकथा और कलिमहिमा कहना
- मुद्रित पृष्ठ
- 1002, 1002
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।