उत्तरकाण्ड · दोहा 78 (ख) · दोहा
राकापति षोडस उअहिं तारागन समुदाइ।
मूल पाठ
राकापति षोडस उअहिं तारागन समुदाइ।
सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ॥ ७८ (ख)॥
स्रोत अभिलेख 7.78 · पुस्तक पृ. 981, 981
भावार्थ
मूल पाठ के बादसभी तारागणोंके साथ सोलह कलाओंसे पूर्ण चन्द्रमा उदय हो और जितने पर्वत हैं उन सबमें दावाग्रि लगा दी जाय, तो भी सूर्यके उदय हुए बिना रात्रि नहीं जा सकती॥ ७८ (ख)॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 981 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1राकापति षोडस उअहिं तारागन समुदाइ।
English explanation
Even if sixteen full moons rise together with a multitude of stars—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राकापति | पूर्णिमा का चंद्रमा | the full moon |
| षोडस | सोलह | sixteen |
| उअहिं | उदित हों | rise |
| तारागन | तारों का समूह | the multitude of stars |
| समुदाइ | एकत्र होकर, साथ में | assembled together; accompanying |
2सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ॥ ७८ (ख)॥
English explanation
And even if all the mountains are set ablaze with forest fire, the night does not pass without the sun.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सकल | सभी | all |
| गिरिन्ह | पर्वतों पर | on the mountains |
| दव | दावानल, जंगल की आग | forest fire |
| लाइअ | लगा दिया जाए | be kindled; be set |
| बिनु | बिना | without |
| रबि | सूर्य | the sun |
| राति | रात | the night |
| न | नहीं | not |
| जाइ | जाती या समाप्त होती | passes or ends |
| ख | पद-संदर्भ का चिह्न ‘ख’ | verse-reference marker ‘ख’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 78 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 7.78
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 981
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 981, 981
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।