उत्तरकाण्ड · दोहा 31 · दोहा
यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास।
यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास।
पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास॥ ३१॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.31 · पुस्तक पृ. 940, 940
भावार्थ और शब्दार्थ
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1यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास।
यह प्रतापरूपी सूर्य जब किसी के हृदय में प्रकाश करता है—
English explanation
When this sun-like glory shines in someone’s heart—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| यह | यह | this |
| प्रताप | प्रताप; प्रभावशाली तेज | glory; powerful radiance |
| रबि | सूर्य | sun |
| जाकें | जिसके | in whose |
| उर | हृदय में | heart |
| जब | जब | when |
| करइ | करता है | makes; causes |
| प्रकास | प्रकाश | light |
2पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास॥ ३१॥
तो बाद में बताए गए बढ़ते हैं, और जो पहले बताए गए थे, वे नष्ट हो जाते हैं।
English explanation
Then those mentioned later increase, while those mentioned first perish.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पछिले | बाद में बताए गए | those mentioned later |
| बाढ़हिं | बढ़ते हैं | increase |
| प्रथम | पहले | first; earlier |
| जे | जो | those which |
| कहे | बताए गए | were mentioned |
| ते | वे | they |
| पावहिं | पाते हैं | meet with |
| नास | नाश | destruction |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 31
- स्रोत अभिलेख
- 7.31
- सहायक विषय
- पुत्रोत्पत्ति, अयोध्याजीकी रमणीयता, सनकादिका आगमन और संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 940, 940
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।