उत्तरकाण्ड · दोहा 58 · दोहा
भव बंधन ते छूटहिं नर जपि जा कर नाम।
भव बंधन ते छूटहिं नर जपि जा कर नाम।
खर्ब निसाचर बाँधेउ नागपास सोइ राम॥ ५८॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.58 · पुस्तक पृ. 963, 963
भावार्थ और शब्दार्थ
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1भव बंधन ते छूटहिं नर जपि जा कर नाम।
जिनका नाम जपकर मनुष्य संसार के बंधन से छूट जाते हैं—
English explanation
By chanting whose name people are freed from the bondage of worldly existence—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भव | संसार; जन्म-मरण का चक्र | worldly existence; the cycle of birth and death |
| बंधन | बंधन | bondage |
| ते | से | from |
| छूटहिं | मुक्त हो जाते हैं | are freed |
| नर | मनुष्य | people |
| जपि | जपकर | by chanting |
| जा | जिनका; जिस का | whose |
| कर | का; संबंधसूचक | possessive marker |
| नाम | नाम | name |
2खर्ब निसाचर बाँधेउ नागपास सोइ राम॥ ५८॥
उन्हीं राम को एक तुच्छ राक्षस ने नागपाश में बाँध दिया।
English explanation
That very Rama was bound in a serpent-noose by an insignificant demon.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| खर्ब | तुच्छ; नगण्य | insignificant; paltry |
| निसाचर | राक्षस; यहाँ इंद्रजित | demon; here, Indrajit |
| बाँधेउ | बाँध दिया | bound |
| नागपास | नागपाश में; सर्पों के बंधन में | in a serpent-noose |
| सोइ | वही; उन्हीं | that very; the same |
| राम | भगवान राम | Lord Rama |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 58
- स्रोत अभिलेख
- 7.58
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 963, 963
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