उत्तरकाण्ड · दोहा 57 · दोहा
तब कछु काल मराल तनु धरि तहँ कीन्ह निवास।
तब कछु काल मराल तनु धरि तहँ कीन्ह निवास।
सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउँ कैलास॥ ५७॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.57 · पुस्तक पृ. 962, 962
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1तब कछु काल मराल तनु धरि तहँ कीन्ह निवास।
तब मैंने कुछ समय तक हंस का शरीर धारण करके वहाँ निवास किया। (यह एआई द्वारा तैयार अर्थ-प्रारूप है।)
English explanation
Then, assuming the body of a swan, I stayed there for some time. (This is an AI-generated draft interpretation.)
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तब | तब | then |
| कछु | कुछ | some |
| काल | समय | time |
| मराल | हंस का | of a swan |
| तनु | शरीर | body |
| धरि | धारण करके | having assumed |
| तहँ | वहाँ | there |
| कीन्ह | किया | made |
| निवास | निवास | a dwelling or stay |
2सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउँ कैलास॥ ५७॥
आदरपूर्वक श्रीराम के गुण सुनकर मैं फिर कैलास लौट आया।
English explanation
After reverently listening to the virtues of Rama, I returned to Mount Kailasa.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सादर | आदरपूर्वक | reverently |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| रघुपति | रघुकुल के स्वामी श्रीराम के | of Rama, lord of the Raghu lineage |
| गुन | गुण | virtues |
| पुनि | फिर | then again |
| आयउँ | मैं आया | I came back |
| कैलास | कैलास पर्वत पर | to Mount Kailasa |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 57
- स्रोत अभिलेख
- 7.57
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 962, 962
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।