उत्तरकाण्ड · दोहा · दोहा
भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार।
मूल पाठ
भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार।
जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार॥
स्रोत अभिलेख मंगलाचरण · पुस्तक पृ. 905, 906
भावार्थ
मूल पाठ के बादभरतजीकी दाहिनी आँख और दाहिनी भुजा बार-बार फड़क रही है। इसे शुभ शकुन जानकर उनके मनमें अत्यन्त हर्ष हुआ और वे विचार करने लगे—
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 906 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार।
English explanation
Bharata's right eye and right arm were twitching repeatedly.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भरत | भरत की; राम के भाई | Bharata's; Rama's brother |
| नयन | आँख | eye |
| भुज | भुजा | arm |
| दच्छिन | दाहिनी | right |
| फरकत | फड़क रही थीं | were twitching |
| बारहिं | बार-बार | repeatedly |
| बार | बार | time |
2जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार॥
English explanation
Recognizing this as an auspicious omen, Bharata felt great joy and began to reflect.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जानि | जानकर | recognizing |
| सगुन | शुभ शकुन | an auspicious omen |
| मन | मन में | in his heart |
| हरष | हर्ष | joy |
| अति | बहुत | great |
| लागे | लगे | began |
| करन | करने | to undertake |
| बिचार | विचार | reflection |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा
- स्रोत अभिलेख
- मंगलाचरण
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 906
- सहायक विषय
- मंगलाचरण
- मुद्रित पृष्ठ
- 905, 906
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