उत्तरकाण्ड · दोहा 61 · दोहा
बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग।
बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग।
मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग॥ ६१॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.61 · पुस्तक पृ. 965, 965
भावार्थ और शब्दार्थ
1बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग।
एआई प्रारूप: सत्संग के बिना हरि की कथा नहीं मिलती और उस कथा के बिना मोह दूर नहीं होता।
English explanation
AI draft: Without holy company, one does not receive the account of the Lord; without that account, delusion does not depart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिनु | बिना | without |
| सतसंग | संतों और सज्जनों की संगति | holy company |
| न | नहीं | not |
| हरि | भगवान की | of the Lord |
| कथा | कथा; भगवान के चरित का वर्णन | account of the Lord’s deeds |
| तेहि | उस हरि-कथा के | that account of the Lord |
| बिनु | बिना | without |
| मोह | मोह; अज्ञानजनित आसक्ति | delusion; attachment born of ignorance |
| न | नहीं | not |
| भाग | दूर होता | departs |
2मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग॥ ६१॥
एआई प्रारूप: मोह दूर हुए बिना श्रीराम के चरणों में दृढ़ प्रेम नहीं होता।
English explanation
AI draft: Until delusion departs, steadfast love for Lord Rama’s feet does not arise.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मोह | मोह; अज्ञानजनित आसक्ति | delusion; attachment born of ignorance |
| गएँ | दूर हुए | having departed |
| बिनु | बिना | without |
| राम | श्रीराम के | of Lord Rama |
| पद | चरणों में | at the feet |
| होइ | होता; उत्पन्न होता | arises |
| न | नहीं | not |
| दृढ़ | अटल; स्थिर | steadfast |
| अनुराग | प्रेम; भक्तिपूर्ण लगाव | love; devotional attachment |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 61
- स्रोत अभिलेख
- 7.61
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 965, 965
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।