उत्तरकाण्ड · दोहा 14 (क) · दोहा
बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग।
बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग॥ १४ (क)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.14 · पुस्तक पृ. 923, 924
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग।
AI-निर्मित अर्थ-प्रारूप: हे श्रीरंग, मैं बार-बार यह वर माँगता हूँ; प्रसन्न होकर इसे दीजिए।
English explanation
AI-generated draft meaning: O Lord, consort of Lakshmi, I repeatedly ask this boon; graciously grant it with joy.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बार | बार; अगले ‘बार’ के साथ बार-बार | time; with the next word, repeatedly |
| बार | बार; पिछले ‘बार’ के साथ बार-बार | time; with the preceding word, repeatedly |
| बर | वरदान | boon |
| मागउँ | मैं माँगता हूँ | I ask |
| हरषि | प्रसन्न होकर | with joy |
| देहु | दीजिए | please grant |
| श्रीरंग | हे लक्ष्मीपति प्रभु राम | O Rama, Lord and consort of Lakshmi |
2पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग॥ १४ (क)॥
आपके चरण-कमलों में कभी न छूटने वाली भक्ति और सदा सत्संग दीजिए।
English explanation
Grant me unfailing devotion to your lotus feet and the constant company of the virtuous.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पद | चरण | feet |
| सरोज | कमल; यहाँ कमल-समान चरण | lotuses; here, lotus-like feet |
| अनपायनी | कभी न छूटने वाली, अटूट | unfailing, never ceasing |
| भगति | भक्ति | devotion |
| सदा | सदैव | always |
| सतसंग | संतों और सज्जनों की संगति | company of saints and the virtuous |
| क | दोहा १४ के प्रथम भाग का संदर्भ-चिह्न | reference marker for the first part of couplet 14 |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 14 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.14
- सहायक विषय
- राम-राज्याभिषेक, वेदस्तुति, शिवस्तुति
- मुद्रित पृष्ठ
- 923, 924
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।