उत्तरकाण्ड · दोहा 73 (ख) · दोहा
निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ।
निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ।
सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ॥ ७३ (ख)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.73 · पुस्तक पृ. 976, 976
भावार्थ और शब्दार्थ
1निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ।
निर्गुण रूप को समझना अत्यंत सुलभ है, पर सगुण रूप को कोई नहीं जान पाता।
English explanation
The attributeless form is very easy to apprehend, yet no one can fathom the form endowed with attributes.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निर्गुन | गुणों से रहित | without attributes |
| रूप | स्वरूप | form or nature |
| सुलभ | सहज समझ में आने वाला | easy to apprehend |
| अति | अत्यंत | very |
| सगुन | गुणों सहित ईश्वर का रूप | the divine form with attributes |
| जान | जानता या समझ पाता है | knows or fathoms |
| नहिं | नहीं | not |
| कोइ | कोई भी | anyone |
2सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ॥ ७३ (ख)॥
उनके नाना प्रकार के, कुछ सहज समझ में आने वाले और कुछ समझ से परे चरित्र सुनकर मुनियों के मन में भी भ्रम होता है।
English explanation
Hearing his varied deeds, some readily understood and others beyond comprehension, even sages become perplexed in mind.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुगम | सहज समझ में आने वाले | readily understandable |
| अगम | समझ से परे | beyond comprehension |
| नाना | विविध प्रकार के | various |
| चरित | चरित्र और लीलाएँ | deeds and acts |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| मुनि | मुनियों के | of sages |
| मन | मन में | in the mind |
| भ्रम | भ्रम या संशय | perplexity or doubt |
| होइ | होता है | arises |
| ख | दोहा ७३ का संदर्भ-चिह्न (ख) | reference marker (b) for verse 73 |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 73 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 7.73
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 976, 976
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।