उत्तरकाण्ड · दोहा 110 (घ) · दोहा
तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्बग्य सुजान।
तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्बग्य सुजान।
सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहहु भगवान॥ ११० (घ)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.11 · पुस्तक पृ. 1014, 1016
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्बग्य सुजान।
तब मैंने कहा, ‘हे कृपा के भंडार, आप सर्वज्ञ और सुजान हैं।
English explanation
Then I said, ‘O treasure of compassion, you are all-knowing and wise.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तब | तब | then |
| मैं | मैंने | I |
| कहा | कहा | said |
| कृपानिधि | हे कृपा के भंडार | O treasure of compassion |
| तुम्ह | आप | you |
| सर्बग्य | सब कुछ जानने वाले | all-knowing |
| सुजान | ज्ञानी; विवेकशील | wise; discerning |
2सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहहु भगवान॥ ११० (घ)॥
हे पूज्य मुनि, मुझे सगुण ब्रह्म की आराधना बताइए।’
English explanation
O revered sage, teach me the worship of Brahman endowed with attributes.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सगुन | गुणों सहित; सगुण | endowed with attributes |
| ब्रह्म | परम सत्य ब्रह्म | Brahman, the ultimate reality |
| अवराधन | आराधना; उपासना | worship; devotional practice |
| मोहि | मुझे | to me |
| कहहु | बताइए | please explain |
| भगवान | हे पूज्य मुनि | O revered sage |
| घ | पद-संदर्भ चिह्न (घ) | verse reference marker (घ) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 110 (घ)
- स्रोत अभिलेख
- 7.11
- सहायक विषय
- गुरुजीका शिवजीसे अपराध-क्षमापन, शापानुग्रह और काकभुशुण्डिकी आगेकी कथा
- मुद्रित पृष्ठ
- 1014, 1016
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