उत्तरकाण्ड · दोहा 89 (ख) · दोहा/सोरठा
कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु।
कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु।
चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ।।89(ख)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.89 · पुस्तक पृ. 991, 991
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु।
हे प्रिय, क्या कोई सहज संतोष के बिना शांति पा सकता है?
English explanation
Dear one, can anyone find peace without natural contentment?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कोउ | कोई | anyone |
| बिश्राम | विश्राम, शांति | rest; peace |
| कि | क्या | can? |
| पाव | पा सकता है | obtain |
| तात | हे प्रिय | dear one |
| सहज | सहज, स्वाभाविक | natural; spontaneous |
| संतोष | संतोष | contentment |
| बिनु | बिना | without |
2चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ।।89(ख)।।
क्या जल के बिना नाव चल सकती है, भले ही करोड़ों उपाय करते-करते कोई खपकर मर जाए?
English explanation
Can a boat move without water, even if one wears oneself out and dies making countless efforts?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चलै | चल सकती है | can move |
| कि | क्या | can? |
| जल | जल के | water |
| बिनु | बिना | without |
| नाव | नाव | a boat |
| कोटि | करोड़ों, असंख्य | millions; countless |
| जतन | प्रयत्न करके | making efforts |
| पचि | खपकर | wearing oneself out |
| पचि | बार-बार खपकर | exhausting oneself repeatedly |
| मरिअ | मर जाए | one may die |
| ख | पद-संदर्भ का चिह्न ‘ख’ | verse-reference marker ‘ख’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 89 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 7.89
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 991, 991
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।