उत्तरकाण्ड · दोहा 26 · दोहा
अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज।
अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज।
सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज॥ २६॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.26 · पुस्तक पृ. 935, 935
भावार्थ और शब्दार्थ
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1अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज।
अयोध्या के निवासियों के सुख और संपत्ति की प्रचुरता का वर्णन—
English explanation
The abundance of happiness and wealth enjoyed by the residents of Ayodhya—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अवधपुरी | अयोध्या नगरी | the city of Ayodhya |
| बासिन्ह | निवासियों | the residents |
| कर | का | of |
| सुख | सुख | happiness |
| संपदा | धन-संपत्ति | wealth and prosperity |
| समाज | प्रचुर समूह | abundance |
2सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज॥ २६॥
हजार शेषनाग भी उसका वर्णन नहीं कर सकते—जहाँ राजा राम विराजमान हैं।
English explanation
Even a thousand Sheshas could not describe it, where King Rama reigns.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सहस | हजार | a thousand |
| सेष | शेषनाग | Shesha, the divine serpent |
| नहिं | नहीं | not |
| कहि | वर्णन कर | describe |
| सकहिं | सकते हैं | can |
| जहँ | जहाँ | where |
| नृप | राजा | King |
| राम | राम, अयोध्या के राजा | Rama, ruler of Ayodhya |
| बिराज | विराजमान हैं | reigns |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 26
- स्रोत अभिलेख
- 7.26
- सहायक विषय
- पुत्रोत्पत्ति, अयोध्याजीकी रमणीयता, सनकादिका आगमन और संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 935, 935
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