उत्तरकाण्ड · छंद · छंद
बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दसंन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं। उनमें वैराग्य नहीं रहा, उसे विषयोंने हर लिया। तपस्वी धनवान् हो गये और गृहस्थ दरिद्र। हे तात! कलियुगकी लीला कुछ कही नहीं जाती॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1003 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती।।
तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कही।।
स्रोत अभिलेख 7.101 · पुस्तक पृ. 1003, 1003
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती।।
English explanation
AI draft: Ascetics lavish money on decorating their dwellings. Sensual pleasures have robbed them of detachment; dispassion no longer remains.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बहु | बहुत | much |
| दाम | धन | money |
| सँवारहिं | सजाते हैं | decorate |
| धाम | निवास | dwellings |
| जती | यति; संयमी संन्यासी | ascetics |
| बिषया | विषय-भोगों ने | sensual pleasures |
| हरि | हरकर | having stolen away |
| लीन्हि | ले लिया | took away |
| न | नहीं | not |
| रहि | रही | remained |
| बिरती | विरक्ति; वैराग्य | dispassion; detachment |
2 तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कही।।
English explanation
Ascetics are wealthy, while householders are poor. Dear one, the strange reversals of the age of Kali cannot be fully told.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तपसी | तपस्वी | ascetics |
| धनवंत | धनवान | wealthy |
| दरिद्र | गरीब | poor |
| गृही | गृहस्थ | householders |
| कलि | कलियुग के | of the age of Kali |
| कौतुक | विचित्र उलटफेर | strange reversals |
| तात | हे प्रिय तात | dear one |
| न | नहीं | not |
| जात | जा सकते | can be |
| कही | कहे | told |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 7.101
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1003
- सहायक विषय
- काकभुशुण्डिका अपनी पूर्वजन्मकथा और कलिमहिमा कहना
- मुद्रित पृष्ठ
- 1003, 1003
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।