उत्तरकाण्ड · छंद · छंद
नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दमनुष्य रोगोंसे पीडि़त हैं, भोग (सुख) कहीं नहीं है। बिना ही कारण अभिमान और विरोध करते हैं। दस-पाँच वर्षका थोड़ा-सा जीवन है, परन्तु घमंड ऐसा है मानो कल्पान्त (प्रलय) होनेपर भी उनका नाश नहीं होगा॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1004 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं।।
लघु जीवन संबतु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा।।2।।
स्रोत अभिलेख 7.102 · पुस्तक पृ. 1004, 1005
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं।।
English explanation
People are afflicted by disease, and enjoyment is nowhere to be found. Pride and needless hostility prevail.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नर | मनुष्य | people |
| पीड़ित | सताए हुए | afflicted |
| रोग | रोगों से | by disease |
| न | नहीं | no |
| भोग | भोग-सुख | worldly enjoyment |
| कहीं | कहीं भी | anywhere |
| अभिमान | अहंकार | pride |
| बिरोध | विरोध; वैर | hostility; opposition |
| अकारनहीं | बिना कारण ही | without any cause |
2 लघु जीवन संबतु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा।।2।।
English explanation
Life is short—only fifteen years—yet pride and hopes seem as though they would not perish even at the end of an aeon.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लघु | छोटा; अल्प | short |
| जीवन | जीवन; आयु | life; lifespan |
| संबतु | वर्ष | years |
| पंच | पाँच | five |
| दसा | दस | ten |
| कलपांत | कल्प के अंत तक | until the end of an aeon |
| न | नहीं | not |
| नास | नाश; समाप्ति | destruction; ending |
| गुमानु | अभिमान | pride |
| असा | आशा; अभिलाषा | hope; desire |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 7.102
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1004
- सहायक विषय
- काकभुशुण्डिका अपनी पूर्वजन्मकथा और कलिमहिमा कहना
- मुद्रित पृष्ठ
- 1004, 1005
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।