उत्तरकाण्ड · छंद · छंद
जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी।
मूल पाठ
जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी।
नख निर्गता मुनि बंदिता त्रेलोक पावनि सुरसरी।।
ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे।
पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे।।4।।
स्रोत अभिलेख 7.13 · पुस्तक पृ. 921, 923
भावार्थ
मूल पाठ के बादजो चरण शिवजी और ब्रह्माजीके द्वारा पूज्य हैं, तथा जिन चरणोंकी कल्याणमयी रजका स्पर्श पाकर [शिला बनी हुई] गौतम ऋषिकी पत्नी अहल्या तर गयी; जिन चरणोंके नखसे मुनियोंद्वारा वन्दित, त्रैलोक्यको पवित्र करनेवाली देवनदी गङ्गाजी निकलीं और ध्वजा, वज्र, अंकुश और कमल, इन चिह्नोंसे युक्त जिन चरणोंमें वनमें फिरते समय काँटे चुभ जानेसे घ_े पड़ गये हैं; हे मुकुन्द! हे राम! हे रमापति! हम आपके उन्हीं दोनों चरणकमलोंको नित्य भजते रहते हैं॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 922 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी।
English explanation
Those feet worshipped by Shiva and Brahma, whose auspicious dust delivered the sage's wife Ahalya by its touch—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जे | जिन | which |
| चरन | चरणों को | feet |
| सिव | शिव | Shiva |
| अज | ब्रह्मा | Brahma, the creator |
| पूज्य | पूजनीय मानते हैं | hold worthy of worship |
| रज | चरणों की धूल | dust of the feet |
| सुभ | मंगलकारी | auspicious |
| परसि | स्पर्श करके | by touching |
| मुनिपतिनी | मुनि गौतम की पत्नी अहल्या | Ahalya, wife of sage Gautama |
| तरी | उद्धार पा गईं | was delivered |
2 नख निर्गता मुनि बंदिता त्रेलोक पावनि सुरसरी।।
English explanation
From whose toenail emerged the Ganges, revered by sages and purifier of the three worlds—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नख | चरण के नख से | from the toenail |
| निर्गता | निकली हुई | emerged |
| मुनि | मुनियों द्वारा | by sages |
| बंदिता | वंदित | revered |
| त्रेलोक | तीनों लोकों को | the three worlds |
| पावनि | पवित्र करने वाली | purifying |
| सुरसरी | गंगा | the Ganges |
3 ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे।
English explanation
Bearing the marks of a flag, thunderbolt, goad, and lotus, those feet suffered thorns while roaming the forest—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ध्वज | ध्वजा का चिह्न | flag mark |
| कुलिस | वज्र का चिह्न | thunderbolt mark |
| अंकुस | अंकुश का चिह्न | goad mark |
| कंज | कमल का चिह्न | lotus mark |
| जुत | से युक्त | bearing |
| बन | वन में | in the forest |
| फिरत | विचरते समय | while roaming |
| कंटक | काँटों की चोट | the piercing of thorns |
| किन | जिन्होंने | which |
| लहे | सही | suffered |
4 पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे।।4।।
English explanation
We ever worship that pair of lotus feet of Rama, giver of liberation and Lord of Lakshmi.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पद | चरण | feet |
| कंज | कमल जैसे | lotus-like |
| द्वंद | दोनों | the pair |
| मुकुंद | मुक्ति देने वाले | giver of liberation |
| राम | राम | Rama |
| रमेस | लक्ष्मी के स्वामी | Lord of Lakshmi |
| नित्य | सदा | always |
| भजामहे | हम भजन करते हैं | we worship |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 7.13
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 922
- सहायक विषय
- राम-राज्याभिषेक, वेदस्तुति, शिवस्तुति
- मुद्रित पृष्ठ
- 921, 923
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।