उत्तरकाण्ड · छंद · छंद
गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं।।
मूल पाठ
गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं।।
रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं।।10।।
स्रोत अभिलेख 7.14 · पुस्तक पृ. 923, 924
भावार्थ
मूल पाठ के बादआप गुण, शील और कृपाके परम स्थान हैं। आप लक्ष्मीपति हैं, मैं आपको निरन्तर प्रणाम करता हूँ। हे रघुनन्दन! [आप जन्म-मरण, सुख-दु:ख, राग-द्वेषादि] द्वन्द्व-समूहोंका नाश कीजिये। हे पृथ्वीकी पालना करनेवाले राजन्! इस दीन जनकी ओर भी दृष्टि डालिये॥ १०॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 924 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं।।
English explanation
I continually bow to the beloved of Lakshmi, the supreme abode of virtues, noble conduct, and compassion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गुन | गुणों के | of virtues |
| सील | सदाचार के | of noble conduct |
| कृपा | करुणा के | of compassion |
| परमायतनं | परम आश्रय | supreme abode |
| प्रनमामि | मैं प्रणाम करता हूँ | I bow |
| निरंतर | निरंतर | continually |
| श्रीरमनं | लक्ष्मी के प्रिय प्रभु को | to the beloved of Lakshmi |
2 रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं।।10।।
English explanation
O Rama, joy of Raghu’s line, destroy the dense mass of conflicting dualities. O protector of the earth, look upon this helpless person.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रघुनंद | हे रघुकुल को आनंद देने वाले | O joy of Raghu’s line |
| निकंदय | नष्ट करें | destroy |
| द्वंद्वघनं | द्वंद्वों का घना समूह | dense mass of dualities |
| महिपाल | हे पृथ्वी के पालक | O protector of the earth |
| बिलोकय | दृष्टि डालें | look upon |
| दीन | दीन | helpless |
| जनं | इस जन को | this person |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 7.14
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 924
- सहायक विषय
- राम-राज्याभिषेक, वेदस्तुति, शिवस्तुति
- मुद्रित पृष्ठ
- 923, 924
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।