उत्तरकाण्ड · छंद · छंद
अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दजिन्हें आपके चरणकमलोंमें प्रीति नहीं है वे नित्य ही अत्यन्त दीन, मलिन (उदास) और दु:खी रहते हैं। और जिन्हें आपकी लीला-कथाका आधार है, उनको संत और भगवान् सदा प्रिय लगने लगते हैं॥ ६॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 924 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं।।
अवलंब भवंत कथा जिन्ह के।। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें।।6।।
स्रोत अभिलेख 7.14 · पुस्तक पृ. 923, 924
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं।।
English explanation
Those who have no love for your lotus feet remain exceedingly wretched, impure, and unhappy.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अति | बहुत | exceedingly |
| दीन | दीन | wretched |
| मलीन | मलिन | impure |
| दुखी | दुःखी | unhappy |
| नितहीं | सदा ही | always |
| जिन्ह | जिन | those whose |
| के | के भीतर | within whom |
| पद | आपके चरण | your feet |
| पंकज | कमल रूपी | lotus-like |
| प्रीति | प्रेम | love |
| नहीं | नहीं है | is absent |
2 अवलंब भवंत कथा जिन्ह के।। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें।।6।।
English explanation
Those whose support is your story always cherish the saints and you, the infinite Lord.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अवलंब | आश्रय | support |
| भवंत | आपकी | your |
| कथा | कथा | story |
| जिन्ह | जिनका | whose |
| के | है | is |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| संत | संतजन | saints |
| अनंत | अनंत प्रभु | the infinite Lord |
| सदा | सदा | always |
| तिन्ह | उन | those people |
| कें | को | to |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 7.14
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 924
- सहायक विषय
- राम-राज्याभिषेक, वेदस्तुति, शिवस्तुति
- मुद्रित पृष्ठ
- 923, 924
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।