उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दहे असुरोंके शत्रु! जगत्में बिना हेतुके (नि:स्वार्थ) उपकार करनेवाले तो दो ही हैं—एक आप, दूसरे आपके सेवक। जगत्में [शेष] सभी स्वार्थके मित्र हैं। हे प्रभो! उनमें स्वप्रमें भी परमार्थका भाव नहीं है॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 954 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।।
स्वारथ मीत सकल जग माहीं। सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं।।
स्रोत अभिलेख 7.47 · पुस्तक पृ. 953, 954
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।।
English explanation
O foe of demons, two in this world do good without self-interest: you and your servant.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हेतु | स्वार्थपूर्ण प्रयोजन | self-interested motive |
| रहित | से रहित | without |
| जग | संसार में | in the world |
| जुग | दो | two |
| उपकारी | उपकार करने वाले | benefactors |
| तुम्ह | आप | you |
| तुम्हार | आपका | your |
| सेवक | सेवक | servant |
| असुरारी | हे असुरों के शत्रु राम | O Rama, foe of demons |
2 स्वारथ मीत सकल जग माहीं। सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं।।
English explanation
O Lord, throughout the world people are friends for self-interest; selfless concern for others is not found even in dreams.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| स्वारथ | अपने लाभ के लिए | for self-interest |
| मीत | मित्र | friends |
| सकल | समस्त | entire |
| जग | संसार | world |
| माहीं | में | in |
| सपनेहुँ | स्वप्न में भी | even in dreams |
| प्रभु | हे प्रभु | O Lord |
| परमारथ | निःस्वार्थ परहित | selfless concern for others |
| नाहीं | नहीं है | is absent |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.47
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 954
- सहायक विषय
- श्रीरामजीका प्रजाको उपदेश (श्रीरामगीता), पुरवासियोंकी कृतज्ञता
- मुद्रित पृष्ठ
- 953, 954
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।