उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दसब भाई अनुकूल रहकर उनकी सेवा करते हैं। श्रीरामजीके चरणोंमें उनकी अत्यन्त अधिक प्रीति है। वे सदा प्रभुका मुखारविन्द ही देखते रहते हैं कि कृपालु श्रीरामजी कभी हमें कुछ सेवा करनेको कहें॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 934 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई।।
प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं। कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं।।
स्रोत अभिलेख 7.25 · पुस्तक पृ. 934, 935
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई।।
English explanation
All the brothers serve with willing devotion; their love for Rama’s feet is exceedingly deep.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सेवहिं | सेवा करते हैं | serve |
| सानकूल | अनुकूल, प्रसन्न भाव से | with a willing, favorable disposition |
| सब | सभी | all |
| भाई | राम के भाई | Rama’s brothers |
| राम | भगवान राम | Lord Rama |
| चरन | चरणों में | at the feet |
| रति | प्रेम, अनुराग | love, devotion |
| अति | अत्यंत | exceedingly |
| अधिकाई | प्रगाढ़, बहुत अधिक | deep and abundant |
2 प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं। कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं।।
English explanation
They keep gazing at the Lord’s lotus-like face, hoping that the compassionate Lord might sometime say something to them.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रभु | प्रभु राम | the Lord, Rama |
| मुख | मुख | face |
| कमल | कमल-समान | lotus-like |
| बिलोकत | देखते | gazing |
| रहहीं | रहते हैं | keep on |
| कबहुँ | कभी | sometime |
| कृपाल | कृपालु प्रभु | the compassionate Lord |
| हमहि | हमसे, हमें | to us |
| कछु | कुछ | something |
| कहहीं | कहें | might say |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.25
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 934
- सहायक विषय
- पुत्रोत्पत्ति, अयोध्याजीकी रमणीयता, सनकादिका आगमन और संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 934, 935
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।