उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं।।
मूल पाठ
श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं।।
ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती।।
स्रोत अभिलेख 7.53 · पुस्तक पृ. 959, 959
भावार्थ
मूल पाठ के बादजगत्में कानवाला ऐसा कौन है जिसे श्रीरघुनाथजीके चरित्र न सुहाते हों। जिन्हें श्रीरघुनाथजीकी कथा नहीं सुहाती, वे मूर्ख जीव तो अपनी आत्माकी हत्या करनेवाले हैं॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 959 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं।।
English explanation
Who in the world, possessing ears, would not find the deeds of Rama, lord of the Raghu lineage, pleasing?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| श्रवनवंत | कानों वाला; सुनने की क्षमता वाला | possessing ears; able to hear |
| अस | ऐसा | such |
| को | कौन | who |
| जग | जगत | the world |
| माहीं | में | in |
| जाहि | जिसे | to whom |
| न | नहीं | not |
| रघुपति | रघुकुल के स्वामी राम के | of Rama, lord of the Raghu lineage |
| चरित | चरित; कर्म और जीवनकथा | deeds and life story |
| सोहाहीं | अच्छे लगें; सुहाएँ | are pleasing |
2 ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती।।
English explanation
Those who do not find Rama’s story pleasing are insensible beings who harm their own spiritual welfare.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ते | वे | those |
| जड़ | जड़; विवेकहीन | insensible; undiscerning |
| जीव | जीव; प्राणी | beings |
| निजात्मक | अपने ही आत्मस्वरूप का | of their own self |
| घाती | नाश करने वाले; हानि पहुँचाने वाले | destroyers; those who harm |
| जिन्हहि | जिन्हें | to whom |
| न | नहीं | not |
| रघुपति | रघुकुल के स्वामी राम की | of Rama, lord of the Raghu lineage |
| कथा | कथा | story |
| सोहाती | सुहाती; अच्छी लगती | is pleasing |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.53
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 959
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 959, 959
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।