उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
राम सुनहु मुनि कह कर जोरी। कृपासिंधु बिनती कछु मोरी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दमुनिने हाथ जोड़कर कहा—हे कृपासागर श्रीरामजी! मेरी कुछ विनती सुनिये! आपके आचरणों (मनुष्योचित चरित्रों) को देख-देखकर मेरे हृदयमें अपार मोह (भ्रम) होता है॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 954 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
राम सुनहु मुनि कह कर जोरी। कृपासिंधु बिनती कछु मोरी।।
देखि देखि आचरन तुम्हारा। होत मोह मम हृदयँ अपारा।।
स्रोत अभिलेख 7.48 · पुस्तक पृ. 954, 955
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 राम सुनहु मुनि कह कर जोरी। कृपासिंधु बिनती कछु मोरी।।
English explanation
Joining his hands, the sage said, ‘Rama, ocean of compassion, please listen; I have a request.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | हे राम | O Rama |
| सुनहु | सुनिए | please listen |
| मुनि | वसिष्ठ मुनि | sage Vasistha |
| कह | कहते हैं | says |
| कर | हाथ | hands |
| जोरी | जोड़कर | having joined |
| कृपासिंधु | हे कृपा के सागर | O ocean of compassion |
| बिनती | विनती | request |
| कछु | कुछ | some |
| मोरी | मेरी | my |
2 देखि देखि आचरन तुम्हारा। होत मोह मम हृदयँ अपारा।।
English explanation
Seeing your conduct again and again, my heart becomes profoundly bewildered.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| देखि | देखकर | seeing |
| देखि | बार-बार देखकर | seeing repeatedly |
| आचरन | आचरण | conduct |
| तुम्हारा | आपका | your |
| होत | होता है | arises |
| मोह | मोह, बुद्धि का चकित होना | bewilderment |
| मम | मेरे | my |
| हृदयँ | हृदय में | in the heart |
| अपारा | असीम | boundless |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.48
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 954
- सहायक विषय
- श्रीराम-वसिष्ठ-संवाद, श्रीरामजीका भाइयोंसहित अमराईमें जाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 954, 955
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।