उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
राम बिमुख लहि बिधि सम देही। कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दजो श्रीरामजीके विमुख है वह यदि ब्रह्माजीके समान शरीर पा जाय तो भी कवि और पण्डित उसकी प्रशंसा नहीं करते। इसी शरीरसे मेरे हृदयमें रामभक्ति उत्पन्न हुई। इसीसे हे स्वामी! यह मुझे परम प्रिय है॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 998 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
राम बिमुख लहि बिधि सम देही। कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही।।
राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी।।
स्रोत अभिलेख 7.96 · पुस्तक पृ. 998, 998
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 राम बिमुख लहि बिधि सम देही। कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही।।
English explanation
Even if someone turned away from Rama obtains a body like Brahma’s, poets and learned people do not praise that person.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | राम से | from Rama |
| बिमुख | विमुख | turned away |
| लहि | पाकर भी | even after obtaining |
| बिधि | सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के | of Brahma, the creator |
| सम | समान | like |
| देही | शरीर | a body |
| कबि | कवि | poets |
| कोबिद | विद्वान | learned people |
| न | नहीं | not |
| प्रसंसहिं | प्रशंसा करते | praise |
| तेही | उसकी | that person |
2 राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी।।
English explanation
My lord, devotion to Rama arose in my heart in this very body; therefore this body is exceedingly dear to me.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | राम की | to Rama |
| भगति | भक्ति | devotion |
| एहिं | इसी में | in this very |
| तन | शरीर | body |
| उर | हृदय में | in the heart |
| जामी | उत्पन्न हुई | arose |
| ताते | इसलिए | therefore |
| मोहि | मुझे | to me |
| परम | अत्यंत | exceedingly |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| स्वामी | हे स्वामी | my lord |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.96
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 998
- सहायक विषय
- काकभुशुण्डिका अपनी पूर्वजन्मकथा और कलिमहिमा कहना
- मुद्रित पृष्ठ
- 998, 998
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।