उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं। आपु गए अरु घालहिं आनहिं।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दवे माता, पिता, गुरु और ब्राह्मण किसीको नहीं मानते। आप तो नष्ट हुए ही रहते हैं, [साथ ही अपने संगसे] दूसरोंको भी नष्ट करते हैं। मोहवश दूसरोंसे द्रोह करते हैं। उन्हें न संतोंका संग अच्छा लगता है, न भगवान्की कथा ही सुहाती है॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 948 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं। आपु गए अरु घालहिं आनहिं।।
करहिं मोह बस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा।।
स्रोत अभिलेख 7.4 · पुस्तक पृ. 947, 948
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं। आपु गए अरु घालहिं आनहिं।।
English explanation
They do not honor their mother, father, teacher, or Brahmins. They are themselves ruined and bring others to ruin as well.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मातु | माता | mother |
| पिता | पिता | father |
| गुर | गुरु; शिक्षक | teacher; spiritual guide |
| बिप्र | ब्राह्मण | Brahmins |
| न | नहीं | not |
| मानहिं | आदर करते हैं | they honor |
| आपु | स्वयं | themselves |
| गए | नष्ट हुए; पतित हुए | have come to ruin |
| अरु | और | and |
| घालहिं | नष्ट करते हैं; पतन में डालते हैं | they bring to ruin |
| आनहिं | दूसरों को | others |
2 करहिं मोह बस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा।।
English explanation
Under the sway of delusion, they act maliciously toward others. They do not enjoy the company of saints or accounts of Hari.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करहिं | करते हैं | they do |
| मोह | मोह; विवेक ढकने वाला आसक्ति-भाव | delusion; blinding attachment |
| बस | के वश में | under the sway of |
| द्रोह | द्वेषपूर्ण आचरण | malicious conduct |
| परावा | दूसरों के प्रति | toward others |
| संत | संतों की | of saints |
| संग | संगति | company |
| हरि | भगवान हरि की | of the Lord Hari |
| कथा | कथा; गुणों और चरित्र का वर्णन | accounts of divine deeds and qualities |
| न | नहीं | not |
| भावा | सुहाती; प्रिय लगती | pleases them |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.4
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 948
- सहायक विषय
- हनुमान्जीके द्वारा भरतजीका प्रश्न और श्रीरामजीका उपदेश
- मुद्रित पृष्ठ
- 947, 948
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।