उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।।
मूल पाठ
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।।
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता।।
स्रोत अभिलेख 7.45 · पुस्तक पृ. 952, 952
भावार्थ
मूल पाठ के बादभक्ति स्वतन्त्र है और सब सुखोंकी खान है। परन्तु सत्संग (संतोंके संग) के बिना प्राणी इसे नहीं पा सकते। और पुण्यसमूहके बिना संत नहीं मिलते। सत्संगति ही संसृति (जन्म-मरणके चक्र)का अन्त करती है॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 952 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।।
English explanation
Devotion is independent and a treasury of all happiness; yet beings do not attain it without the company of the good and holy.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भक्ति | भक्ति | devotion |
| सुतंत्र | स्वतंत्र | independent |
| सकल | समस्त | all |
| सुख | सुखों की | of happiness |
| खानी | खान, भंडार | mine, treasury |
| बिनु | बिना | without |
| सतसंग | संतों और सज्जनों का संग | company of the holy and good |
| न | नहीं | not |
| पावहिं | प्राप्त करते हैं | attain |
| प्रानी | जीव | living beings |
2 पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता।।
English explanation
Without an accumulation of merit, one does not meet saints; their company brings the cycle of worldly existence to an end.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुन्य | पुण्यों का | of spiritual merit |
| पुंज | संचय | accumulation |
| बिनु | बिना | without |
| मिलहिं | मिलते हैं | are encountered |
| न | नहीं | not |
| संता | संत | saints |
| सतसंगति | संतों की संगति | company of saints |
| संसृति | जन्म-मरण का संसार | the cycle of worldly existence |
| कर | का | of |
| अंता | अंत | end |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.45
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 952
- सहायक विषय
- श्रीरामजीका प्रजाको उपदेश (श्रीरामगीता), पुरवासियोंकी कृतज्ञता
- मुद्रित पृष्ठ
- 952, 952
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।