उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माही।।
मूल पाठ
बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माही।।
तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिरु नाए।।
स्रोत अभिलेख 7.16 · पुस्तक पृ. 926, 926
भावार्थ
मूल पाठ के बादउन लोगोंको अपने घर भूल ही गये। [जाग्रत्की तो बात ही क्या] उन्हें स्वप्रमें भी घरकी सुध (याद) नहीं आती, जैसे संतोंके मनमें दूसरोंसे द्रोह करनेकी बात कभी नहीं आती। तब श्रीरघुनाथजीने सब सखाओंको बुलाया। सबने आकर आदरसहित सिर नवाया॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 926 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माही।।
English explanation
AI draft: They had forgotten their homes and did not remember them even in dreams, just as malice toward others has no place in the minds of saints.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिसरे | भूल गए थे | had forgotten |
| गृह | घर | their homes |
| सपनेहुँ | सपने में भी | even in dreams |
| सुधि | याद | remembrance |
| नाहीं | नहीं थी | was absent |
| जिमि | जैसे | just as |
| परद्रोह | दूसरों के प्रति द्रोह | malice toward others |
| संत | संतों के | of saints |
| मन | मन | minds |
| माही | में | within |
2 तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिरु नाए।।
English explanation
Then Rama summoned all his companions. They all came and respectfully bowed their heads.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तब | तब | then |
| रघुपति | रघुवंश के स्वामी श्रीराम ने | Rama, lord of Raghu’s lineage |
| सब | सभी | all |
| सखा | मित्रों को | his companions |
| बोलाए | बुलाया | summoned |
| आइ | आकर | having come |
| सबन्हि | सभी ने | all of them |
| सादर | आदरपूर्वक | respectfully |
| सिरु | सिर | their heads |
| नाए | झुकाए | bowed |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.16
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 926
- सहायक विषय
- वानरोंकी और निषादकी विदाई
- मुद्रित पृष्ठ
- 926, 926
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।