उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा। निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा।।
मूल पाठ
बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा। निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा।।
पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा। सगुन उपासन कहहु मुनीसा।।
स्रोत अभिलेख 7.111 · पुस्तक पृ. 1016, 1018
भावार्थ
मूल पाठ के बादमुनिने मुझे अनेकों प्रकारसे समझाया, पर निर्गुण मत मेरे हृदयमें नहीं बैठा। मैंने फिर मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर कहा—हे मुनीश्वर! मुझे सगुण ब्रह्मकी उपासना कहिये॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1017 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा। निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा।।
English explanation
The sage explained it to me in many ways, but the doctrine of the attributeless did not find acceptance in my heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिबिध | अनेक | various |
| भाँति | प्रकार से | in ways |
| मोहि | मुझे | to me |
| मुनि | मुनि ने | the sage |
| समुझावा | समझाया | explained |
| निर्गुन | गुणरहित ब्रह्म का | of attributeless Brahman |
| मत | सिद्धांत | doctrine |
| मम | मेरे | my |
| हृदयँ | हृदय में | in the heart |
| न | नहीं | not |
| आवा | उतरा; स्वीकार हुआ | found acceptance |
2 पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा। सगुन उपासन कहहु मुनीसा।।
English explanation
Then, bowing my head at his feet, I said: O foremost sage, teach me worship of the divine with attributes.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुनि | फिर | then |
| मैं | मैंने | I |
| कहेउँ | कहा | said |
| नाइ | झुकाकर | bowing |
| पद | चरणों में | at his feet |
| सीसा | सिर | my head |
| सगुन | गुण और रूपयुक्त ईश्वर की | of the divine with attributes and form |
| उपासन | उपासना | worship |
| कहहु | बताइए | please teach |
| मुनीसा | हे मुनिश्रेष्ठ | O foremost sage |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.111
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1017
- सहायक विषय
- काकभुशुण्डिजीका लोमशजीके पास जाना और शाप तथा अनुग्रह पाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 1016, 1018
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।