उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा।।
मूल पाठ
बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा।।
प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती। करत बिचार उरग आराती।।
स्रोत अभिलेख 7.58 · पुस्तक पृ. 963, 963
भावार्थ
मूल पाठ के बादसर्पोंके भक्षक गरुडज़ी बन्धन काटकर गये, तब उनके हृदयमें बड़ा भारी विषाद उत्पन्न हुआ। प्रभुके बन्धनको स्मरण करके सर्पोंके शत्रु गरुडज़ी बहुत प्रकारसे विचार करने लगे—॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 963 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा।।
English explanation
Garuda, the serpent-eater, cut the bonds and departed; intense distress arose in his heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बंधन | बंधनों को | the bonds |
| काटि | काटकर | having cut |
| गयो | चले गए | departed |
| उरगादा | सर्पभक्षी गरुड़ | Garuda, the serpent-eater |
| उपजा | उत्पन्न हुआ | arose |
| हृदयँ | हृदय में | in his heart |
| प्रचंड | अत्यंत तीव्र | intense |
| बिषादा | विषाद, मानसिक व्यथा | distress, despondency |
2 प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती। करत बिचार उरग आराती।।
English explanation
Garuda, the enemy of serpents, pondered in many ways, trying to understand the Lord’s being bound.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रभु | प्रभु राम के | of Lord Rama |
| बंधन | बंधन को | being bound |
| समुझत | समझने का प्रयास करते हुए | trying to understand |
| बहु | अनेक | many |
| भाँती | प्रकार से | in ways |
| करत | करते थे | was engaged in |
| बिचार | विचार | reflection |
| उरग | सर्पों के | of serpents |
| आराती | शत्रु, गरुड़ | the enemy, Garuda |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.58
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 963
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 963, 963
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