उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
प्रभु जानी कैकेई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी।।
मूल पाठ
प्रभु जानी कैकेई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी।।
ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा।।
स्रोत अभिलेख 7.1 · पुस्तक पृ. 917, 917
भावार्थ
मूल पाठ के बाद[शिवजी कहते हैं—] हे भवानी! प्रभुने जान लिया कि माता कैकेयी लज्जित हो गयी हैं। [इसलिये] वे पहले उन्हींके महलको गये और उन्हें समझा-बुझाकर बहुत सुख दिया। फिर श्रीहरिने अपने महलको गमन किया॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 917 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 प्रभु जानी कैकेई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी।।
English explanation
AI draft: O Bhavani, the Lord recognized that Kaikeyi was ashamed, so he went first to her house.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रभु | प्रभु राम ने | Lord Rama |
| जानी | जान लिया | recognized |
| कैकेई | कैकेई, राम की सौतेली माता | Kaikeyi, Rama’s stepmother |
| लजानी | लज्जित हैं | was ashamed |
| प्रथम | सबसे पहले | first |
| तासु | उनके, अर्थात कैकेई के | her, referring to Kaikeyi |
| गृह | घर | house |
| गए | गए | went |
| भवानी | हे भवानी, पार्वती | O Bhavani, goddess Parvati |
2 ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा।।
English explanation
He reassured her and gave her great comfort; then Rama, called Hari, went to his own residence.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ताहि | उन्हें, कैकेई को | her, Kaikeyi |
| प्रबोधि | समझाकर और आश्वस्त करके | having reassured |
| बहुत | बहुत | much |
| सुख | सुख और सांत्वना | comfort |
| दीन्हा | दिया | gave |
| पुनि | फिर | then |
| निज | अपने | his own |
| भवन | भवन | residence |
| गवन | जाना | going |
| हरि | हरि, यहाँ राम | Hari, here Rama |
| कीन्हा | किया | undertook |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.1
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 917
- सहायक विषय
- श्रीरामजीका स्वागत, भरत-मिलाप, सबका मिलनानन्द
- मुद्रित पृष्ठ
- 917, 917
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।