उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
पाछिल मोह समुझि पछिताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना।।
मूल पाठ
पाछिल मोह समुझि पछिताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना।।
पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा।।
स्रोत अभिलेख 7.93 · पुस्तक पृ. 995, 995
भावार्थ
मूल पाठ के बादवे अपने पिछले मोहको समझकर (याद करके) पछताने लगे कि मैंने अनादि ब्रह्मको मनुष्य करके माना। गरुडज़ीने बार-बार काकभुशुण्डिजीके चरणोंपर सिर नवाया और उन्हें श्रीरामजीके ही समान जानकर प्रेम बढ़ाया॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 995 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 पाछिल मोह समुझि पछिताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना।।
English explanation
Recognizing his earlier delusion, Garuda regretted having regarded the beginningless Absolute as a human being.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पाछिल | पहले का | previous; earlier |
| मोह | मोह, भ्रम | delusion |
| समुझि | समझकर | having understood |
| पछिताना | पछताए | regretted |
| ब्रह्म | परम सत्य ब्रह्म, यहाँ राम | the Absolute, here Rama |
| अनादि | जिसका कोई आरंभ नहीं | beginningless |
| मनुज | मनुष्य | a human being |
| करि | के रूप में, समझकर | as; taking to be |
| माना | मान लिया था | had regarded |
2 पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा।।
English explanation
Garuda repeatedly bowed his head at Kakabhushundi’s feet and, regarding him as equal to Rama, deepened his love for him.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुनि | फिर | again |
| पुनि | फिर | again |
| काग | काकभुसुंडि के | of Kakabhushundi, the crow sage |
| चरन | चरणों में | at the feet |
| सिरु | सिर | head |
| नावा | झुकाया | bowed |
| जानि | जानकर, मानकर | recognizing; regarding |
| राम | भगवान राम के | to Lord Rama |
| सम | समान | equal |
| प्रेम | प्रेम | love |
| बढ़ावा | बढ़ाया | deepened; increased |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.93
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 995
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 995, 995
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।