उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
नाना भाँति निछावरि करहीं। परमानंद हरष उर भरहीं।।
मूल पाठ
नाना भाँति निछावरि करहीं। परमानंद हरष उर भरहीं।।
कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि। चितवति कृपासिंधु रनधीरहि।।
स्रोत अभिलेख 7.7 · पुस्तक पृ. 914, 915
भावार्थ
मूल पाठ के बादअनेकों प्रकारसे निछावरें करती हैं और हृदयमें परमानन्द तथा हर्ष भर रही हैं। कौसल्याजी बार-बार कृपाके समुद्र और रणधीर श्रीरघुवीरको देख रही हैं॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 914 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 नाना भाँति निछावरि करहीं। परमानंद हरष उर भरहीं।।
English explanation
They make offerings in many ways and fill their hearts with supreme bliss and joy.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नाना | अनेक | many |
| भाँति | प्रकार से | in ways |
| निछावरि | निछावर, सम्मान में अर्पित वस्तुएँ | offerings made in loving honor |
| करहीं | करती हैं | make |
| परमानंद | परम आनंद | supreme bliss |
| हरष | हर्ष | joy |
| उर | हृदय | hearts |
| भरहीं | भरती हैं | fill |
2 कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि। चितवति कृपासिंधु रनधीरहि।।
English explanation
Kaushalya gazes again and again at Rama, the ocean of compassion and the steadfast hero in battle.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कौसल्या | राम की माता कौसल्या | Kaushalya, Rama's mother |
| पुनि | फिर | again |
| पुनि | फिर; बार-बार | again; repeatedly |
| रघुबीरहि | रघुवंश के वीर राम को | at Rama, hero of the Raghu lineage |
| चितवति | देखती हैं | gazes |
| कृपासिंधु | कृपा के सागर | the ocean of compassion |
| रनधीरहि | युद्ध में धीर-वीर राम को | at the steadfast hero in battle |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.7
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 914
- सहायक विषय
- श्रीरामजीका स्वागत, भरत-मिलाप, सबका मिलनानन्द
- मुद्रित पृष्ठ
- 914, 915
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